गोपालगंज सिविल कोर्ट ने 30 फरवरी 2005 को की मुकदमे की सुनवाई!

सिविल कोर्ट में 30 फरवरी को मुकदमे में न सिर्फ पैरवी होती है, बल्कि कोर्ट सुनवाई भी करती है. इतना ही नहीं, कोर्ट के अवकाश के दिनों में 31 दिसंबर को मुकदमा दाखिल होता है और 30 फरवरी, 2005 को गोपालगंज के प्रथम अवर न्यायाधीश के कोर्ट ने टीएस संख्या-556/04 में सुनवाई कर दोनों पक्षों की दलीलों को सुना है.

30 फरवरी पढ़कर आप भी चौक गये होंगे, लेकिन कोर्ट के कागजों में ऐसा हुआ है, जबकि सर्वविदित है कि फरवरी का महीना लीप इयर में ही 29 दिनों का होता है. यहां तो 30 फरवरी को कोर्ट सुनवाई करता है. भाएद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे भू माफिया योगेंद्र पड़ित की तरफ से 31 दिसंबर, 2004 को सब जज एक के कोर्ट में मुकदमा संख्या 556/04 अपने पड़ोसी कमल पड़ित के खिलाफ दाखिल किया जाता है. 31 दिसंबर को अक्सर कोर्ट बंद रहता है.

कोर्ट के अवकाश की अवधि में यह मुकदमा दाखिल किया गया है. भू माफिया का आरोप है कि भितभेरवा के प्लाॅट नं 1404, खाता नं 251 हथुआ राज की दो एकड़ सात कट्ठा 17 धूर जमीन है, जिसमें से 28 अगस्त, 1935 को योगेंद्र पड़ित के पिता गोखुला कोहार के नाम से हथुआ राज सात डिसमिल जमीन आवंटित करता है. उसी जमीन को भूदान के मंत्री ने 10 धूर जमीन कमल को आवंटित करते हैं. कमल पर यह भी आरोप है कि अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्तियों के मेल में आकर योगेंद्र पड़ित की कोठरी पर कब्जा जमा लिया है. इसी मामले में कोर्ट में सुनवाई के दौरान 30 फरवरी 2005 को प्रथम अवर न्यायाधीश की कोर्ट में सुनवाई किये जाने का कारनामा किया गया है.

कमल के परिवार को नहीं थी मुकदमे की जानकारी
कमल पड़ित के खिलाफ दर्ज कराये गये इस मामले की उन्हें जानकारी नहीं थी. कमल के नाम पर किसी और को खड़ा कराकर कोर्ट में उनकी तरफ से हाजिरी और पैरवी करायी गयी. कमल पड़ित इस मामले में 10 जून, 2005 को कोर्ट में उपस्थित होकर अपना लिखित पक्ष प्रस्तुत करते हैं, पुन: 31 मार्च, 2006 को लिखित बयान कराया जाता है, लेकिन हकीकत यह थी कि कमल के परिवार के लोगों को इस पूरे मामले की जानकारी नहीं थी. कोर्ट ने इस मामले में 13 जुलाई, 2006 को अपना फैसला दिया. जब कमल पड़ित के खिलाफ दखल-दहानी के लिए मुकदमा दखिल होता है तो पांच दिसंबर, 2018 को उनके परिवार को जानकारी होती है और इस मामले में 25 जनवरी, 2019 को नकल जारी होती है.
पूरी तरह फर्जीवाड़ा : विधिज्ञ संघ
विधिज्ञ संघ गोपालगंज के अध्यक्ष शैलेश कुमार तिवारी ने कहा कि प्रथम अवर न्यायाधीश के कोर्ट की ऑर्डर शीट को पढ़ने के बाद स्पष्ट है कि यह लिपिकीय भूल नहीं है. 29 जनवरी, 2005 को 30 फरवरी, 2005 के लिए तिथि का निर्धारण होता है और 30 फरवरी को मुकदमे में सुनवाई होती है. इससे स्पष्ट है कि पूरा ऑर्डर शीट फर्जी है.
कोर्ट के कर्मियों की संलिप्तता से भू-माफियाओं ने इस तरह का फर्जीवाड़ा किया है. ऐसे फर्जीवाड़े से कोर्ट की गरिमा पर चोट पहुंची है. कोर्ट को इस मामले में गंभीरता से निर्णय लेने की जरूरत है.जिला लोक अभियोजक देववंश उर्फ भानु गिरि ने कहा कि मामला काफी गंभीर है. इसमें भू-माफियाओं पर न सिर्फ आपराधिक मामला दर्ज  होना चाहिए, बल्कि संबंधित कोर्ट से भी इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए.

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